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सुप्रसिद्ध व्याख्याता और लेखक कुंवर कनक सिंह राव राजस्थान की शिक्षा जगत में एक तेजस्वी सूर्य के समान हैं, जिनके प्रकाश से शिक्षा के क्षेत्र में सभी नक्षत्र अपनी आभा से शिक्षार्थियों के जीवन को आलोकित कर रहे हैं। कांठल-प्रतापगढ़ के पास ठिकाना ठलभू में जन्मे कुंवर कनक सिंह राव बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी और हरफनमौला व्यक्तित्व के स्वामी रहे हैं। एक छोटे से गाँव में जन्म लेने के बावजूद अपनी अद्भुत प्रतिभा और उच्च कोटि के चरित्र के बल पर उन्होंने न सिर्फ शिक्षा, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया और जहाँ भी गए, सफलता के शिखर पर पहुँचे। केवल 14 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में ‘कुँवर क्रांति’ के नाम से अपनी पहचान बना ली थी। जल्द ही, अखिल भारतीय कवि के रूप में उन्होंने ख्याति प्राप्त की और अपने ओजस्वी और वीर रस से भरपूर काव्य पाठ से राष्ट्र की युवा पीढ़ी में उत्साह और चेतना का संचार किया। वर्तमान में शिक्षा जगत के एक प्रमुख हस्ताक्षर, कर्मठ लेखक और कुशल शिक्षक के रूप में ख्यात कुंवर कनक सिंह राव का जन्म राजस्थान के कांठल, प्रतापगढ़ के पास स्थित ठिकाना 'ढलमू' में हुआ था। 14 वर्ष की अल्पायु में ही वह 'कुँवर क्रांति' के नाम से साहित्य जगत में प्रतिष्ठित हो गए और अखिल भारतीय मंचों पर वीर रस के कवि के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की। उनके ओजस्वी और आशावादी काव्य ने पाठकों और श्रोताओं का दिल जीत लिया। साहित्य के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी एक चमकते सितारे की तरह अपनी पहचान बनाई। 1997 में बी.एड. की डिग्री प्राप्त करने के बाद, 1997-98 में रेलवे स्टेशन मास्टर परीक्षा में चयनित हुए, 1998 में राज्य पुलिस उप निरीक्षक परीक्षा उत्तीर्ण की और 1999 में ए.ई.सी.एस. में टी.जी.टी. के रूप में कार्य किया। 2000 में उन्होंने इतिहास के प्राध्यापक के रूप में शिक्षा जगत में अपनी सेवाएँ दीं और राजस्थान के युवाओं के बीच इतिहास के अध्यापक के रूप में एक अविस्मरणीय स्थान प्राप्त किया, जो आज भी कायम है।

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